हर साल सेना दिवस बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन सेना के पराक्रम, शौर्य के साथ-साथ शहीदों को श्रद्धांजलि भी दी जाती है. इस साल 15 जनवरी को हमने अपना 72वां सेना दिवस मनाया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हम सेना दिवस आखिर क्यों मनाते है. 15 जनवरी को ऐसा क्या हुआ था कि इसी दिन ही सेना दिवस मनाया जाता है. तो आपको बता दें कि इस तारीख को सेना दिवस इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1949 में जनरल कोडनान मडप्पा करियप्पा ने स्वतंत्र भारत के पहले सेना प्रमुख के रूप में पदभार संभाला था. तीन दशक तक भारतीय सेना में सेवा देने वाले जनरल केएम करियप्पा रिटायर होने के बाद भी किसी न किसी रूप में सेना में अपनी सेवाएं देते रहे. इसके साथ ही वो 1953 में रिटायर हो गए थे.

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इतना ही नहीं करियप्पा भारतीय सेना के पहले 5 स्टार रैंक के अधिकारी थे. बता दें कि अब तक भारत में केवल जनरल मॉनेकशॉ को ही 5 स्टार नवाजा गया है. आपको जनरल करियप्पा के सेना करियर से जुड़ी एक कहानी सुनाती हूं. जिससे आपको उनके डेडिकेशन का पता चल जाएगा.  दरअसल पाकिस्तान और भारत के बॉर्डर पर जनरल करियप्पा के बेटे का फाइटर पाकिस्तान ने मार गिराया था. जब पाकिस्तान को पता चला कि उस फाइटर मे जनरल करियप्पा का बेटा था. तो पाकिस्तान ने जनरल करियप्पा के बेटे को वापस लौटाने की पहल की. लेकिन जनरल करियप्पा ने अपने बेटे की आजादी लेने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि जब भारत के अन्य कैदियों को रिहा किया जाए.

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तब उनके बेटे को भी उन्हीं के साथ रिहा कर दिया जाए. जनरल करियप्पा के इस बयान से ही आप उनके देश के प्रति समर्पण भाव को समझ सकते हैं. लेकिन, क्या आपको पता है कि देश के पहले सेनाध्यक्ष के रूप में जनरल करियप्पा तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली पसंद नहीं थे. जी हां नेहरू को भारत से ज्यादा अंग्रेजों पर भरोसा था. जिसके लिए उन्होंने अंग्रेज अधिकारी को सेनाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव भी रखा था.

दरअसल देश की आजादी के बाद से सरकार लगातार इस पर विचार कर रही थी कि सेना की कमान किसे सौंपी जाए? इसके लिए नेहरू ने एक बैठक बुलाई और बैठक को सम्बोधित करते हुए तत्कालीन पीएम ने कहा कि ‘किसी भी भारतीय के पास सेना के नेतृत्व का अनुभव नहीं है, इसीलिए ये पद किसी अंग्रेज को ही देना चाहिए.’ बैठक में सबने नेहरू की हाँ में हाँ मिलाई.

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लेकिन एक सैन्य अधिकारी ऐसे भी थे जो नेहरू की राय से इत्तिफाक नहीं रखते थे. वो शख्स थे- लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौड़. जिनके अदम्य साहस और विचारों के आगे जवाहर सरकार को छुकना पड़ा. और इसके बाद के.एम करियप्पा को भारत का पहला सेना प्रमुख नियुक्त किया गया. वैसे गौर किया जाए तो ये पहला मौका नहीं है जब नेहरू पर इस तरह के आरोप लगाए जा रहे हो. इसके पहले भी जवाहर लाल नेहरू पर कई तरह के बलंडर करने के आरोप लगाए जा चुके है. जिसमें भारत और पाकिस्तान के विभाजन का जिम्मेदार भी नेहरू को ही ठहराया जाता है.

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