प्रयागराज के कुंभ मेले में अगर कोई सबसे जादा श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है, तो वे हैं संन्यासी. इनमें भी लोग नागा संन्यासियों की तरफ ज्यादा खिंचे चले आ रहे हैं. इनके श्रृंगार और इनके शरीर पर लगी हुई भभूति चर्चा का बिषय बने रहते हैं. लोग जानना चाहते हैं कि आखिर ये भभूति क्या है और कैसे बनता है.

नागा संन्यासी पूरे शरीर पर भभूति लपटने के बाद और भी रहस्यमयी नजर आने लगते हैं. लेकिन, ये कोई सामान्य भभूति नहीं होती. बल्कि लंबी क्रिया के बाद तैयार होने वाली एक खास तरह की भभूति होती है. जिसे तैयार करने में घंटों लगते हैं.

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इसे तैयार करने के लिए नागाओं को खासा अभ्यास करना पड़ता है. उसके बाद ही वो इसमें दक्ष हो पाते हैं. भभूति नागा संन्यासियों के सामने हमेशा प्रज्ज्वलित रहने वाली धूना से बनती है. लेकिन, वहां से निकालकर इसे सीधे धारण नहीं किया जाता बल्कि उसे कई विधियों से तैयार किया जाता है.

धूने में सिर्फ बड़, आंवले, बेल, मदार की लकड़ियां ही इस्तेमाल में आती हैं. इससे निकली भभूति में चंदन मिलाकर गाय के उपले में जलाया जाता है. इसके पूरी तरह भस्म हो जाने पर इसे छानकर अलग किया जाता है. उसके बाद इसमें गाय का कच्चा दूध और चंदन मिलाकर इसके लड्डू बनाए जाते हैं. इसके बाद इसको फिर से जलाते हैं.

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जितना बचता है, उसे छानकर फिर अलग करते हैं. एक हिस्से में गंगा जल मिलाकर अलग कर दिया जाता है, उसे गंग भभूति कहते हैं जबकि दूसरे हिस्से को देव भभूति कहते हैं. उसमें कच्चा दूध मिलाकर उसे ही नागा शरीर पर धारण करते हैं.

हिन्दू धर्म के संन्यासियों में से एक नागा सन्यासी अपने पूरे शरीर पर भभूति धारण करते हैं. नागाओं में भी दिगंबर साधु ही शरीर पर भभूति लगाते हैं. ये भभूति ही उनका वस्त्र और प्रमुख श्रृंगार होता है. साथ ही ये भभूति उन्हें बहुत सारी आपदाओं से बचाती है.

कहते हैं कि कुछ नागा बाबा चिता की राख को शुद्ध करके शरीर पर मलते हैं और कुछ अपने धूने की राख को ही शरीर पर मलते हैं. उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं भी आकर्षण का केंद्र रहती है. हाथों में चिमटा, चिलम, कमंडल लिए और चिलम का कश लगते हुए इन साधुओं को देखना असामान्य लगता है.

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