वक्त सबको बदल देता है, वक्त के साथ आपकी कलम की स्याही का रंग बदल जाता है. कई बार आपकी कलम भी बदल जाती है. जिसके नाम से आपने किसी कहानी की शुरुआत की हो शायद वो कहानी ही बदल जाए. उसमे उस शुरुआती नाम का जिक्र भी ना हो. क्या आपको पता है आज मैं ये सब बातें क्यों बोल रहा हूं. इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि 53 साल पहले बाल केशव ठाकरे यानी बाला साहब ठाकरे ने शिवसेना को जिस संकल्प के साथ बनाया. जिस नाम से शिवसेना को जाना जाता था. उस शिवसेना के रंग-रूप अब बदलने लगे हैं. बाला साहेब जिस विचार की बात करते हुए कहते थे की मैं रहूं, ना रहूं लेकिन मेरे विचार, मेरे मूल्य हर शिव सैनिक के कतरे-कतरे में रहेंगे. शायद अब वो विचार शिवसेना के अंदर ही फीके पड़ने लगे हैं.

इसकी एक बानगी तब नजर आई जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर शिवसेना ने अपना घोषणापत्र जारी किया. क्योंकि आने वाले 21 अक्तूबर को महाराष्ट्र में चुनाव हैं, इस घोषणा पत्र में किसानों और ग्रामीण महाराष्ट्र को लेकर कई सारे वादे किए गए हैं लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि इस घोषणा पत्र में अयोध्या मे राम मंदिर बनवाने को लेकर कोई जिक्र नहीं किया गया है.

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इस घोषणा पत्र में किसानों की कर्जमाफी, गरीब किसानों को हर साल 10 हज़ार की आर्थिक मदद. ज़रूरतमंदों को 10 रुपये में खाना, 1000 भोजनालय, बिजली की दरों में कटौती, बेहतर अस्पताल जैसे कई वादे हैं लेकिन राम मंदिर को लेकर कोई वादा नहीं. सोचकर देखिए जिस राम के नाम को लेकर शिवसेना का डंका महाराष्ट्र ही नहीं पूरे भारत में बजना शुरू हो गया था. अब वो भगवान राम का जिक्र अपने घोषणा पत्र में नहीं कर रही और बाला साहेब ठाकरे की हमेशा जिद्द थी, उनका ये संकल्प था कि हम राम मंदिर बनाकर रहेगे. वो तो साफ कहते थे कि अगर राम का मंदिर भारत में नहीं बनेगा तो क्या पाकिस्तान में बनेगा लेकिन अब उनकी नई पीढ़ी शायद राम लला के मंदिर को भूल गई.

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2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने राम मंदिर की रट लगाई थी और बड़े जोर-शोर से अयोध्या भी गए थे. लेकिन अब 3-4 महीने में सब कुछ बदल गया. वैसे एक बड़ा बदलाव और हुआ है वो ये है कि ऐसा पहली बार है, जब शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे के परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़ने जा रहा है. क्योंकि ना कभी बाला साहेब ठाकरे लड़े और ना ही उनके बेटे लेकिन अब बाला साहेब के पोते उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे वर्ली से चुनावी मैदान में हैं. बाला साहेब खुद चुनाव नहीं लडते थे. जब उनसे पूछा जाता था कि आप खुद चुनाव क्यों नहीं लडंते तो वे कहते थे कि जब रिमोट आपके पास हो तो आपको चुनाव लड़ने की क्या जरुरत है. मतलब सरकार को कंट्रोल करने की बात करते थे. एक बड़ा बदलाव और हुआ वो ये कि जो शिवसेना कभी केवल हिन्दूओं की बात करती थी वो अब मुस्लमानों के अधिकारों के लिए लड़ने की बात भी कहती है.

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शिवाजी पार्क में आयोजित पार्टी के दशहरा सम्मेलन में उद्धव ठाकरे ने मंच से ऐलान किया कि उनकी पार्टी सिर्फ ओबीसी और दूसरे पिछड़े वर्गों के साथ ही नहीं है, देशभक्त मुसलमानों के अधिकारों की लड़ाई में भी साथ देगी. फिर उन्होंने याद दिलाया कि छत्रपत्रि शिवाजी महाराज की सेना में भी मुसलमान सैनिक थे. आज अगर बाला साहेब ठाकरे होते तो क्या उद्धव ये सब बोल पाते. ये सबसे बड़ा सवाल है. खैर दोस्तो अब एक बात साफ है कि शिवसेना अब बदलने लगी है. ये बदलाव कोई छोटे बदलाव नहीं हैं ये बदलाव शिवसेना की विचारधारा को पूरी तरह से पलट कर रख देंगे. ऐसा अनुमान है कि शिवसेना अब फिर से अपने आप को नए शिकंजे में डाल रही है. अपने आप को नया आकार दे रही है, कांग्रेस की कद्दावर प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी भी अब शिवसेना के साथ हैं.

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