मंदिर यानी पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा और चढ़ावा. यही होता है, लंगर लगता है, सब लोग खाते हैं लेकिन पुणे का दगडू सेठ हलवाई गणपति मंदिर थोड़ा अलग है. किसी भक्त के नाम से पहचाने जाने वाला देश का ये एकमात्र बडा मंदिर है जो लोगों की सेवा में लगा है. दगडू सेठ हलवाई नाम के व्यक्ति ने सवा सौ साल पहले ये मंदिर बनवाया था और अब ये मंदिर हर साल करीब 15 करोड़ रुपए के सामाजिक काम करता है. आपने देखा होगा कि नवरात्र हो, लोहड़ी हो, कोई और तीज त्यौहार हो तो अक्सर मंदिरों में लंगर लगता है लेकिन इस मंदिर मे लंगर नहीं लगता। ये मंदिर रोज 1200 मरीजों को दोनों समय का खाना, चाय और नाश्ता देता है. मंदिर ने 2016 में यहां के एक अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के लिए बने पांच वार्डों का नवीनीकरण किया.

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साथ ही 70 शिशुओं की क्षमता वाला एनआईसीयू और आईसीयू बनाया. ये ट्रस्ट मरीजों के रहने-खाने का इंतजाम भी करता है. ट्रस्ट से जुड़े महेश सूर्यवंशी बताते हैं कि 20 साल से ये मंदिर सामाजिक काम कर रहा है. जैसे-जैसे मंदिर का चढ़ावा बढ़ता गया, वैसे-वैसे काम भी. 2012 से वे अस्पताल में मरीजों और उनके साथ आए लोगों को भोजन और नाश्ता दे रहे हैं. आपको बता दें कि यहां किसी तरह का भंडारा नहीं किया जाता. भंडारे के स्थान पर हर साल साढ़े तीन करोड़ रुपए का अन्नदान किया जाता है. हर रोज  500 गर्भवती महिलाओं को  मूंगफली के लड्डू बांटते हैं क्योंकि ये पौष्टिक होते हैं। इसके अलावा इस मंदिर के ट्रस्टी हेमंत रासने ने बताया कि सूखागस्त इलाकों में पशुओं के लिए चारे का इंतजाम, नए तालाब बनाने. पुराने तालाबों की गाद निकाली जैसे समाजिक काम भी वे करते है. इस मंदिर के ट्रस्ट की ओर से पिंगोरी में 51 करोड़ लीटर पानी संग्रहित किया जा सके ऐसी व्यवस्था भी कि गई है. ये संस्था बाढ़ पीडितों के लिए भी काम करती है, गांव के उत्थान के लिए भी काम करती है. ये मंदिर भगवान गणेश का मंदिर है और गणेश ज्ञानवर्धन अभियान के तहत इस मंदिर के ट्रस्ट ने 550 गरीब विद्यार्थियों की शिक्षा का जिम्मा उठाया है. जिसमें हर बच्चे पर 18 से 20 हजार रुपए सालाना खर्च किया जा रहा है. अब तक दो हजार से ज्यादा बच्चे इस ट्रस्ट की मदद से पढाई कर चुके हैं. इस मंदिर के ट्रस्ट के कामों की लिस्ट बहुत लंम्बी है. बरगद, पीपल, इमली और नीम के 50 लाख पौधे भी इस संस्था ने लगाए हैं.

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