भले ही चंद्रयान-2 मिशन में भारत की स्पेस एजेंसी इसरो को एक झटका लगा हो और उसका विक्रम लैंडर से संपर्क टूट गया हो. लेकिन, इसरो वैज्ञानिकों ने अभी तक हार नहीं मानी है. वो अब भी विक्रम से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. सिर्फ इसरो ही नहीं इसरो के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी विक्रम लैंडर से संपर्क साधने की कोशिश कर रही है. इस बीच ये जानना भी बेहद जरूरी है कि इस मिशन के बिगड़ने के कारण क्या हैं. आखिर लैंडर विक्रम क्यों चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग नहीं कर पाया.

दरअसल इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के पूर्व निदेशक और आईआईटी खड़गपुर के एडजंक्ट प्रोफेसर तपन मिश्रा ने बताया कि इस मिशन के बिगड़ने के तीन बड़े कारण क्या हो सकते हैं. प्रोफेसर तपन मिश्रा के अनुसार पहला कारण ये कि हो सकता है कि थ्रस्टर्स सही समय पर एकसाथ न स्टार्ट हुए हों. विक्रम लैंडर चांद की सतह से 30 किमी की ऊंचाई पर 1.66 किमी पर सेकंड की रफ्तार से चक्कर लगा रहा था.

जरुर पढ़ें:  Amazing- ये भी कर सकता है आधार कार्ड, जानकर रह जाएंगे दंग

जब उसे चांद की सतह पर उतारना था तब विक्रम लैंडर को सीधा रहना था और उसकी स्पीड 2 मीटर पर सेकंड होनी चाहिए थी. विक्रम लैंडर में पांच बड़े थ्रस्टर्स हैं. जो उसे लैंडिंग में मदद करते. इन्ही थ्रस्टर्स की मदद से विक्रम लैंडर ने चांद के चारों तरफ चक्कर भी लगाए थे. इनके अलावा विक्रम लैंडर पर 8 छोटे थ्रस्टर्स और हैं. ये थ्रस्टर्स छोटे रॉकेट जैसे होते हैं जो किसी वस्तु आगे या पीछे बढ़ाने में मदद करते हैं. विक्रम में पांच बड़े थ्रस्टर्स नीचे लगे थे. और चार थ्रस्टर्स चार कोनों में और एक बीच में.

ये विक्रम को ऊपर-नीचे ले जाने में मदद करते. जबकि, 8 छोटे थ्रस्टर्स विक्रम की दिशा तय करने में मदद करते. ये हो सकता है कि चांद की सतह से 400 मीटर की ऊंचाई पर लैंडिंग के समय सभी बड़े थ्रस्टर्स में एकसाथ ईंधन न पहुंचा हो. इससे ये हुआ होगा कि सारे थ्रस्टर्स एकसाथ स्टार्ट न हुए हों. नतीजा ये कि लैंडर तेजी से घूमने लगा होगा और संतुलन खो दिया होगा. इस समय लैंडर वैसे ही घूम रहा होगा जैसी दिवाली में चकरी आतिशबाजी घूमती है.

जरुर पढ़ें:  अभी चंद्रमा पर नहीं पहुंचा है चंद्रयान -2, जानिए कहां कर रहा है भ्रमण...

दूसरा कारण ये  कि सही समय और सही मात्रा में ईंधन इंजन तक न पहुंचा हो. विक्रम लैंडर का बड़ा हिस्सा ईंधन की टंकी है. लैंडर की हाई स्पीड , ब्रेकिंग की वजह से ईंधन अपनी टंकी में वैसे ही उछल रहा होगा जैसे पानी के टब में पानी उछलता है. इससे इंजन के नॉजल में ईंधन सही से नहीं पहुंचा होगा. इसकी वजह से लैंडिंग के समय थ्रस्टर्स को पूरा ईंधन न मिलने से लैंडिंग में गड़बड़ी आ सकती है.

तीसरा कारण जो प्रोफेसर तपन मिश्रा ने बताया वो ये कि हो सकता है विक्रम चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति यानी ग्रवेटी से लड़ न पाया हो. चांद की सतह से 100 मीटर की ऊंचाई पर विक्रम लैंडर हेलीकॉप्टर की तरह मंडराता. चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को बर्दाश्त करने के लिए अगल-बगल के छोटे थ्रस्टर्स ऑन रहते. लैंडर का कैमरा लैंडिंग वाली जगह खोजता और फिर उतरता. कैमरे से ली गई तस्वीर ऑनबोर्ड कंम्प्यूटर में स्टोर की गई तस्वीर से मैच करती.

जरुर पढ़ें:  मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर के बारे में ये बातें पता है, महावारी के खिलाफ लड़ चुकी है जंग

इसके बाद विक्रम लैंडर धीरे-धीरे चार बड़े थ्रस्टर्स को बंद कर बीच वाले पांचवें थ्रस्टर की मदद से नीचे उतरता. इस वक्त विक्रम लैंडर में लगा रडार अल्टीमीटर लैंडर की ऊंचाई का ख्याल रखता. चुंकि लैंडिंग पूरी तरह से ऑटोमैटिक थी, इसपर पृथ्वी से कंट्रोल नहीं किया जा सकता था. यहीं पर गुरुत्वाकर्षण को विक्रम लैंडर भांप नहीं पाया होगा, क्योंकि वहां गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में बदलाव आता रहता है.

ये तीनों कारण प्रोफेसर तपन मिश्रा ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर किए हैं. आपको बता दें कि  इस मिशन को पूरा करने के लिए वैज्ञानिकों के पास सिर्फ 8 दिनों का समय और बचा है. जी हां 21 सितंबर तक ही वे लैंडर विक्रम से संपर्क साधने की कोशिश कर सकते हैं. इसके बाद लूनर नाइट शुरू हो जाएगी. जहां हालात बिल्कुल बदल जाएंगे. क्योंकि 14 दिन तक ही विक्रम को सूरज की रोशनी मिलेगी.

VK News

Loading...