कल सवेरे आंख खुलते ही जो पहली खबर कान में पड़ी वो थी चंद्रयान 2 की. पता चला कि इस मिशन का सबसे अहम हिस्सा विक्रम लैंडर चांद के नजदीक आकर कहीं खो गया. ऐसा लगा मानो कोई सपना टूटा हो.  हम तो फिर भी घर में चैन की नींद सो रहे थे लेकिन उनका क्या जो 11 साल से रात दिन एक करके इस मिशन पर मेहनत कर रहे थे. हम बात कर रहे हैं इसरो के चीफ के सिवन की जिनकी आंखो के वो आंसू साफ बयां कर रहे थे उऩकी मेहनत और लगन को. जब सिवन रोए तो पूरा देश रोया. सिवन के हिम्मत और हौसले के तारीफ की गई. सोशल मीडिया पर तो मानों इसरो के तारीफ में संदेशों की बाढ़ आ गई. देश के कोने-कोने से लोग इसरो के समर्थन में आए. तो वहीं विदेशी मीडिया और स्पेस एजेंसी ने इसरो के इस साहस में तारीफों के पुल बांध दिए.

चंद्रयान-2 मिशन भले ही अपनी मंजिल से दूर रह गया हो,  लेकिन इसकी तकनीकी दक्षता और स्पेस सुपरपावर बनने की चाह की विदेशी मीडिया ने जमकर तारीफ की. न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, बीबीसी और गार्डियन जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने चंद्रयान-2 पर कई अहम रिपोर्ट प्रकाशित किए.

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अमेरिकी पत्रिका वायर्ड ने चंद्रयान-2 प्रोग्राम को भारत का ‘सबसे महत्वाकांक्षी’ स्पेस मिशन बताया है. वायर्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘विक्रम लैंडर और उसके प्रज्ञान रोवर का चांद की सतह पर न उतर पाना भारतीय स्पेस एजेंसी के लिए बड़ा झटका जरूर है, लेकिन ये नहीं कह सकते कि मून मिशन पूरी तरह खत्म हो गया.’

तो वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत के तकनीकी कौशल और अंतरिक्ष विकास की जमकर तारीफ की है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘चंद्रयान पहली कोशिश में चांद पर भले न उतर पाया हो, लेकिन इससे तकनीकी कौशल और दशकों के अंतरिक्ष विकास का पता जरूर चलता है. चंद्रयान-2 मिशन का एक छोटा हिस्सा असफल होने से भारत उस एलिट क्लब में शामिल होने से चूक गया जो पहले प्रयास में चांद की सतह पर उतर चुके हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने हालांकि इसका जिक्र भी किया कि चंद्रयान का ऑर्बिटर अब भी ऑपरेशन में है और चांद का चक्कर लगा रहा है.’

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ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने चंद्रयान मिशन पर एक खास एक आर्टिकल छापा जिसकी हेडलाइन है, ‘इंडियाज मून लैंडिंग सफर्स लास्ट मिनट कम्युनिकेशंस लॉस’. अखबार ने अपने आर्टिकल में फ्रांसीसी स्पेस एजेंसी सीएनईएस के वैज्ञानिक मैथ्यू वीज के हवाले से लिखा है, भारत आज वहां जा रहा है जहां भविष्य में 20, 50 या 100 साल बाद इंसानों के बसेरे बनेंगे.’

तो उधर वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी हेडलाइन ‘इंडियाज फर्स्ट एटेंप्ट टू लैंड ऑन द मून एपियर्स टू हैव फेल्ड’ में लिखा है कि ‘मून मिशन भारत के लिए सबसे बड़ा गर्व साबित हुआ है. असफलता के बावजूद स्पेस एजेंसी और उसके वैज्ञानिकों के समर्थन में सोशल मीडिया पर वाहवाही का सैलाब देखा गया. ये घटना स्पेस मिशन के तौर पर भले झटका हो लेकिन इसमें भारत की युवा आबादी की महत्वाकांक्षा गहराई से देखी जा सकती है. कम लागत वाला ये स्पेस प्रोग्राम भारत के लिए अपने आप में बड़ी सफलता है. चंद्रयान-2 का खर्च 141 मिलियन डॉलर है जो कि अमेरिका के ऐतिहासिक अपोलो मून मिशन से कई गुना कम है.’

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वहीं बीबीसी ने भी भारत के चंद्रयान मिशन पर न्यूज स्टोरी छापी है. उसने लिखा है कि चंद्रयान की लैंडिंग दुनिया में इसलिए हेडिंग बनी क्योंकि यह काफी किफायती है. बीबीसी ने लिखा, ‘एवेंजर्स: एंडगेम का बजट इससे दोगुना तकरीबन 356 मिलिन अमेरिकी डॉलर है. ये पहली बार नहीं है जब इसरो ने इतने कम खर्च में अपना मिशन चलाया है. इससे पहले 2014 में मार्स मिशन का खर्च मात्र 74 मिलियन अमेरिकी डॉलर था. ये लागत अमेरिका के मैवेन ऑर्बिटर से 10 गुना कम है.’

यहीं नहीं नासा ने भी इसरो की काफी तारीफ की है. विदेशी मीडिया भी इसरो के इस साहस का काय हो गया है.

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