भारत के इतिहास में ये 27वां मौका है, जब किसी राजनीतिक दल के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है।टीडीपी यानि तेलगू देशम पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ ये अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया है। लेकिन क्या आपको पता है, कि ये अविश्वास प्रस्ताव कितनी बार और कब कब कामयाब हुए हैं? यकीनन आपको ये जानकर हैरानी होगी, कि विपक्ष का ये हथियार सिर्फ एक बार कामयाब हो पाया, बाकी मौकों पर विपक्ष को मुंह की ही खानी पड़ी।

भारतीय संसद

भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक बार ही ऐसा मौका आया है जब अविश्वास प्रस्ताव पर केंद्र में सरकार गिरी हो, लेकिन विश्वास मत पर कई बार सरकारें गिर चुकी हैं। पहली बार ऐसा मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार के दौरान हुआ था। तब वे बहुमत साबित नहीं कर पाए और उनकी सरकार चली गई। मोरारजी देसाई आपातकाल के बाद 1977 के चुनावों में जनता पार्टी की शानदार जीत के बाद देश के प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद ही जनता पार्टी में उठापटक शुरू हो गई। चूंकि ये सरकार कई धड़ों से मिलकर बनी थी, इसलिए इन धड़ों में असंतोष होना लाज़िमी था।

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पीवी नरसिम्हाराव और मोरारजी देसाई

मोराराजी सरकार के खिलाफ कुल मिलाकर दो बार अविश्वास प्रस्ताव आए। पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सरकार को कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन दूसरी बार अविश्वास प्रस्ताव पर जनता पार्टी का असंतोष चरम पर था। ये प्रस्ताव कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वाई वी चव्हाण की ओर से लाया गया था। अपनी हार का अंदाज़ा लगते ही मोरारजी देसाई ने वोटिंग से पहले ही 15 जुलाई, 1979 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और इसी के साथ उनकी सरकार गिर गई थी।

इसके बाद वीपी सिंह, एचडी देवेगौडा, आईके गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी की सरकारों ने भी विश्वास मत का सामना किया और वे इस पर खरे नहीं उतर पाए। बात 1979 की है,  कांग्रेस और सीपीआई के समर्थन से जनता दल (एस) के नेता चरण सिंह 28 जुलाई को प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के निर्देश पर चरण सिंह को 20 अगस्त तक लोकसभा में बहुमत साबित करना था। लेकिन इंदिरा गांधी ने दांव चलते हुए 19 अगस्त को ही बहुमत परीक्षण में  चरण सिंह सरकार का साथ देने से इनकार कर दिया। नतीजतन चरण सिंह को बहुमत का सामना करने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ा।

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जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी

इसके बाद 1989 के आम चुनावों में वीपी सिंह की पार्टी राष्ट्रीय मोर्चा को 146 सीटें मिलीं। वो बीजेपी के 86 सासंदों और वामदलों के 52 सांसदों के समर्थन से देश के सातवें प्रधानमंत्री बने। लेकिन  जब उन्होंने अगले ही साल मंडल कमीशन की रिपोर्ट को आंशिक तौर पर लागू किया तो उनकी सरकार के खिलाफ असंतोष शुरू हो गया। वीपी सरकार ने गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के बदले आंतकवादियों की रिहाई का फैसला किया, जिसकी खूब आलोचना हुई, लेकिन उनकी सरकार की गिरने की ये वजहें नहीं थीं।

इसी दौरान सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए रथयात्रा शुरू की। बिहार में लालू यादव की सरकार थी, जहां आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया था। वीपी सिंह सरकार विश्वास प्रस्ताव पर नाकाम रही। बीजेपी ने सरकार के समर्थन से हाथ खींच लिया। लोकसभा के इतिहास की ये पहली गठबंधन सरकार 10 नवम्बर 1990 को गिर गई।

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इसके बाद साल 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा की सरकार उस वक्त गिर गई थी, जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने संयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन वापिस ले लिया था। इसके बाद यही हश्र आईके गुजराल सरकार का हुआ। ये दोनों सरकारें विश्वास मत पर बहुमत नहीं जुटा पाईं थीं।

अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद दो बार विश्वास मत हासिल करने की कोशिश की, लेकिन दोनों बार वे नाकाम रहे। हालांकि तीसरी बार उन्होंने पूरे पांच साल तक NDA की सरकार चलाई। 1996 में तो उन्होंने वोटिंग से पहले ही इस्तीफ़ा देना पड़ा था, जबकि 1998 में उनकी सरकार 13 महीने चली और इस बार विश्वास मत पर उनकी सरकार एक वोट से गिर गई थी।

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