भारत के विकास की बात की जाए तो भारतीय रेलवे प्रगति पर है. प्रगति पर इसलिए है क्योंकि पिछले पांच सालों के अंदर भारतीय रेलवे में काफी बदलाव आएं हैं. इनमें से एक बदलाव का श्रेय भारत की स्पेस एजेंसी इसरो को भी जाता है.

दरअसल एक साल पहले तक ट्रेनों की आवाजाही के बारे में फैसले रेलवे कंट्रोलर नहीं ले पाते थे. लेकिन ये मुमकिन हुआ इसरो के गगन यानी जीपीएस पर आधारित एक नैविगेशन सिस्टम से.  ये सिस्टम सैटलाइट से चलता है, जो कि पहले भारतीय एयरस्पेस के लिए बनाया गया था और अब ये सिस्टम से हर 30 सेकंड पर ट्रेनों की स्पीड और लोकेशन का डेटा देता है, जिससे ट्रेनों की टाइमिंग सटीक हो गई है.

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अब रेलवे कंट्रोलर अपनी छह घंटे की ड्यूटी में ये अधिकार रहेगा कि वो किसी भी ट्रेन को रोक सकते हैं और किसी ट्रेन को आगे कर सकते हैं. यहां तक पटरी पर अगर मरम्मत की जरूरत है, तो इसकी इजाजत भी दे सकते हैं.

इससे पहले की बात करें तो पहले रेलवे कंट्रोलर की ड्यूटी मुश्किल थी. उसका ज्यादातर समय रजिस्टर में ट्रेनों का डेटा फीड करने में ही चला जाता है. ऐसे में वो जरूरत के हिसाब से ट्रेनों को चलाने की प्लानिंग नहीं कर पाता था. अब डेटा सीधा सैटलाइट से जुड़ जाने की वजह से रेलवे कंट्रोलर को ज्यादा समय मिलता है. जिस वजह से अब ट्रेनें समय से पहुंचने लगी है. अगर कोई ट्रेन 60-70 की स्पीड में चल रही है और ट्रैक में 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाई जा सकती है, तो रेलवे कंट्रोलर उस ट्रेन को स्पीड बढ़ाने का निर्देश देते हैं. जबकि पहले दो स्टेशनों के बीच कवर हुई दूरी के आधार पर ट्रेन की स्पीड मापी जाती थी लेकिन अब हर 30 सेकंड में ये पता चलता रहता है.

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फिलहाल देश के करीब आधे लोकोमोटिव इंजनों में नए सिस्टम लग चुकें हैं. मतलब ये सैटलाइट से जुड़ चुके हैं.इसकी लागत की बात करें तो इसमें 120 करोड़ रुपये का खर्च आया है. इसरो का यह सैटलाइट रणनीतिक और गोपनीयता के नजरिए से भी महत्तपूर्ण है, इसलिए उस सैटलाइट का नाम नहीं बताया जा सकता. लेकिन नए सिस्टम से ये साफ है कि हजारों रेलवे कंट्रोलर ट्रेनों को टाइम से पहुंचाने लगे हैं जिसमें इसरो की भूमिका अहम है.

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