आज मकर संक्राति का दिन है, जिससे उत्तर भारत में मकर संक्रति कहा जाता है। तमिलनाडु में इससे पोंगल के नाम से जाना जाता है। जबकि, गुजरात में इससे उतरायण कहते है असम में इसे बिहू के नाम से जाना जाता है और कर्नाटक में इससे पोगंल के नाम से जाना जाता है। केरल में इससे मकर विक्लु कहा जाता है, कश्मीर में शिशुर सिहंग्रा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्यदेव जब धनु राशि से मकर पर पंहुचते है, तो मकर संक्रांति मनाई जाती है।

मकर संक्राति

 

सूर्य के धनु राशि से मकर राशि पर जाने का महत्व इसलिए अधिक है। क्योकि इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है। उत्तरायण देवाताओं का दिन माना जाता है। मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त में स्नान और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। यही नहीं कई जगहों पर तो मूत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए खिचड़ी दान करने का भी विधान है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का प्रसाद बी बांटा जाता है। कई जगहों पर पंतगे उड़ाने की भी पंरपरा है।

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क्या है मकर संक्रांति?

सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते है। एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति के बीच का समय ही सौर मास है। एक जगह से दूसरी जगह जाने अथवा एक-दूसरे का मिलना ही संक्रांति होती है। हालांकि, कुल 12 सूर्य संक्रांति है। लेकिन, इनमें से मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति प्रमुख है।

मकर संक्रांति

हमारे देश में मकर संक्रांति के पर्व का विशेष महत्व है, जिसे हर साल जनवरी के महीने में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सूर्य उत्तरायण होता है, यानी कि पृथ्वी का उत्तरी गोर्लाद्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। पंरपराओं के मुताबिक इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। देश के विभिन्न राज्यों में इस पर्व को अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

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मकर संक्रांति

हालांकि, प्रेत्यक राज्य में इसे मनाने क तरीका जुदा भले ही हो, लेकिन सब जगह सूर्य की उपासना ज़रुर की जाती है। लगभग 80 साल पहले उन दिनों के पंचागों के अनुसार मकर संक्रांति 12 या 13 जनवरी को मनाई जाती थी, लेकिन अब वषिवतों के अग्रगमन के चलते है इसे 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है। साल, 2020 में इसे 15 जनवरी को मनाया गया।

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