अयोध्या में राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तीन मिनट सुनवाई करके तारीख को तीन महीने के लिए आगे बढ़ा दिया है. सोमवार को हुई इस सुनवाई में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के तेवर देखकर तो लगता है, कि वे राम मंदिर के मुद्दे पर जल्द सुनवाई को तैयार नहीं है, क्योंकि उनसे जब इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग की गई तो उन्होंने दो टूक कह दिया, कि कोर्ट के सामने प्राथमिकताएं कुछ और हैं.

जस्टिस रंजन गोगोई (फाइल)

कोर्ट के इस रुख ने मोदी सरकार की चिंता को बढ़ा दिया है. संत समाज और दूसरे संगठन अब सरकार से तुरंत कानून लाकर मंदिर निर्माण की मांग करने लगे हैं. विपक्षी पार्टियां भी कह रही है, कि अध्यादेश या कानून लाकर मंदिर निर्माण कर देना चाहिए. वहीं बीजेपी के अंदर से भी मंदिर निर्माण को लेकर आवाजें उठनी शुरू हो गई है.

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राम मंदिर के लिए संत हुए लामबंद

लेकिन मोदी सरकार के लिए ये करना इतना आसान नहीं होगा क्योंकि उसकी राह में बहुत से रोड़े हैं. क्या है वो अड़चने जिसकी वजह सरकार कानून लाकर मंदिर नहीं बना सकती है- पहली  अड़चन है 1993 में आया वो कानून, जिसके तहत विवादित ज़मीन और उसके आस-पास की जमीन का अधिग्रहण करते हुए पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल याचिकाओं को खत्म कर दिया गया था. दरअसल सरकार की ओर से लाए गए इस अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. 1994 में अदालत ने इस्माइल फारूखी मामले में आदेश देते हुए तमाम दावेदारी वाली अर्जियों को बहाल कर दिया था और जमीन केंद्र सरकार के पास रखने को कहा था. अदालत ने आदेश दिया था, कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे जमीन सौंप दी जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट का आदेश ही सरकार के लिए मुसीबात बन सकता है. मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी भी कहते हैं, कि  1993 में लाए गए कानून को सुप्रीम कोर्ट खारिज करते हुए अर्जियों को खत्म करने को गैर संवैधानिक करार दे चुका है. इसलिए सरकार लंबित मामले पर कानून नहीं ला सकती है. अगर ऐसा होता है, तो ये न्यायिक प्रक्रिया में दखलअंदाजी होगी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की माने तो सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को खारिज या निष्प्रभावी करने के लिए कानून में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं कर सकती है. बल्कि वो फैसले के आधार पर कानून में बदलाव कर सकती है. अयोध्या मामला भी आदालत में पेंडिंग  है और वहां यथास्थिति को बरकरार रखने के लिए कहा गया है. अगर सरकार ऐसे में कोई कानून बनाती है तो ये अदालती कार्यवाही में दखल होगा.

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सुप्रीम कोर्ट (File)

इसीलिए अब एक ही मामला बचता है, कि सरकार पक्षकारों के बीच आपसी समझौता करा दें. अगर समझौता नहीं हो सका, तो कानून लाकर मंदिर बनाकर फिलहाल सरकार के लिए टेढ़ी खीर है. और चुनाव से पहले सरकार के लिए ये बड़ी मुसीबत भी है.

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