नई दिल्ली। सरदार पटेल को लौह पुरुष का दर्जा ऐसे ही नहीं मिला। उनके जीवन में कई ऐसी कहानियां हैं जो बताती हैं कि वो वास्तविक में लौह पुरुष कहलाने के लायक हैं। सरदार वल्लभ भाई पटेल का भारतीय राजनीति से लेकर देश की एकता और अखंडता में भी अभूतपूर्व योगदान रहा।

देश ने कल लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 143वीं जयंती मनाई। इस मौके पर पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात के केवड़िया में उनकी 182 फीट ऊंची प्रतिमा को देश को समर्पित किया। इस प्रतिमा की खास बात यह है कि यह दुनिया में सबसे ऊंची प्रतिमा है। इसे बनाने में 3000 करोड़ रुपए का खर्च आया है। प्रतिमा को देश की जनता के लिए खोल दिया गया है।

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सरदार पटेल की 182 फीट ऊंची प्रतिमा

पटेल की तुलना जर्मनी के एकीकरण के सूत्रधार बिस्मार्क से की जाती है। ना बिस्मार्क ने कभी उपने मूल्यों से समझौता किया और न ही पटेल ने। जब भारत स्वतंत्र हुआ उस समय देश में कुल 562 रियासतें थीं। लेकिन आजादी के बाद भी सभी भारत में सम्मलित नहीं थे। सरदार पटेल ने इन रियासतों को भारत में मिलाकर वह काम किया जो उस कठिन वक्त में संभव नहीं था। यही बातें उन्हें लौह पुरुष का दर्जा दिलाती हैं।

सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड पटेल ने भारत के उन 562 रियासतों के राजाओं को समझाया। कुछ मान गए कुछ नहीं माने। जिन रियासतों ने बात नहीं मानी उनके खिलाफ सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर उन्हें भारत में मिलाया गया। आज जिस प्रकार भारत एकता के सूत्र में बंधा है उसके लिए देश सरदार पटेल का ऋणि है।

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1909 में पटेल को एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के केस की सुनवाई के लिए कोर्ट जाना पड़ा। वे अदालत में जिरह करने लगे। उसी दौरान एक अदालत के एक कर्मचारी ने एक टेलीग्राम उनके हाथ में रख दिया। उसमें लिखा था, ‘उनकी पत्नी का निधन हो गया है।’ लेकिन फिर भी पटेल ने अदालत में जिरह पूरी की। बाद में जज को इस बारे में पता चला। जब जज ने इसका कारण पूछा तो पटेल ने जवाब दिया,’ये तो मेरा फर्ज था। मेरे मुवक्किल को झूठे मामले में फंसाया गया है। मैं अन्याय के पक्ष में कैसे जा सकता हूं।’

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