दशहरा का आयोजन लगभग पूरे देश में धूमभाम से मनाया जा रहा है. साथ ऐसा माना जाता है कि इस दिन असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की विजय हुई. लेकिन आज भी देश में ऐसी कई जगह हैं जहां पर दशहरा को हर्षोल्लास  के साथ नहीं बल्कि शोक साथ मनाया जाता है.

इतना ही नहीं बल्कि कुछ जगह ऐसी भी हैं जहां पर रावण, मेघनाथ और कुंभकरण का पुतला तक जलाना निषेध है. इसके अलावा कुछ जगह ऐसी भी हैं जहां रावण की पूजा होती है और दशहरा वाले दिन उसके निधन पर शोक मनाया जाता है. आप सभी इस बात को भली भांति जानते होंगे, कि रावण जैसा विद्वान आज तक पूरे विश्व में पैदा ही  नहीं हुआ.

यही नहीं बल्कि उसके बराबर शिवभक्‍त आज तक कोई भी नहीं हुआ है. लेकिन आज हम आपको दशहरा और रावण से जुड़ी कुछ ऐसी बातें बताएंगे जिनके बारे में जानकर शायद आप हैरान होगें.

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बता दें कि ग्रेटर नोएडा से 10 किलोमीटर दूर है रावण का पैतृक गांव बिसरख. यहां न रामलीला होती है, न ही रावण दहन किया जाता है. यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है. इस गांव में शिव मंदिर तो है, लेकिन भगवान राम का कोई मंदिर नहीं है. मान्यता यह भी है कि जो यहां कुछ मांगता है, उसकी मुराद पूरी हो जाती है, इसलिए साल भर देश के कोने-कोने से यहां आने-जाने वालों का तांता लगा रहता है.  और साल में दो बार मेला भी लगता है.

पूरे देश मे जहां रावण का पूतला फूँककर दशहरे को धूमधाम से मनाया जाता है तो वहीं रावण के पैतृक गांव नोएडा जिले के बिसरख में इस दिन पूरे गांव में शोक का माहौल रहता है. यहां पर रावण का पुतला जलाना मतलब अपने पूर्वजों को जिंदा जलाना समझा जाता है.. दरअसल रावण के पिता विशरवा मुनि के नाम पर ही गांव का नाम बिसरख पड़ा.

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यही नहीं बल्कि बिसरख गांव में रावण का एक भव्य मंदिर भी बना हुआ है. और यहां के लोग रावण की पूजा करते हैं. माना जाता है कि रावण के पिता विशरवा मुनि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बिसरख गांव में आठ भुजा धारी शिवलिग स्थापित करके मंदिर का निर्माण किया था.

दरअसल बिसरख गांव के अलावा ऐसी ही कई जगह हैं जहां दशहरा के दिन के शोक मनाया जाता है, और साथ ही मंदिरों में रावण की पूजा भी की जाती है..

बता दें कि गुजरात के कोटेश्‍वर‍, विदिशा रावणग्राम और मुरुदेश्‍वरा मंदिर में रावण की मूर्तियां हैं. जहां लोग रावण की पूजा करते हैं. श्रीलंका के कोणेश्‍वरम मंदिर में भी रावण की मूर्ति है. यह दुनिया में रावण के सबसे महत्‍वपूर्ण मंदिरों में से एक है.

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इसके अलावा आंध्र प्रदेश के काकीनादा में भी रावण का भव्य मंदिर है. दरअलस जोधपुर के माउदगिल ब्रह्माण रावण के ही वंशज माने जाते हैं. उन्‍होंने जोधपुर में रावण के मंदिर का निर्माण करवाया है. ऐसा भी माना जाता है कि रावण की पत्‍नी मंदोदरी यहां की ही थी. यहां पर रहने वाले लोग रावण का वशंज बताते हैं और रावण की पूजा करते हैं.

साथ ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कुल्लू दशहरा की यह विशेषता है कि रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते हैं. लुधियाना जिले में स्थित दोराहा के साथ लगते कस्बा पायल में बना रावण का 25 फुट ऊंचा बुत अपनेआप में इतिहास समेटे हुए हैं. यहां रावण की पूजा अर्चना की जाती है.

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