इन दिनों सबरीमाला का मंदिर काफी च्रर्चाओं में बना हुआ है. इसकी वजह है सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला, जिसमें कोर्ट ने मंदिर में महिलाओ की एंट्री पर रोक को हटा दिया. जिसके चलते केरल में कई हिन्दू संगठन इस फैसले के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. और महिलाएं को मंदिर में प्रवेश तक नहीं करने दे रहे हैं. लेकिन इसी बीच आपको सबरीमाला मंदिर से जुड़े नियम और खास बातों से रुबरु कराएंगे, जिसे जानकर शायद आप चौंक जायेंगे.

दरअसल हर साल हज़ारों श्रद्धालु काली लुंगी पहनकर भगवान अयप्पा का नाम जपते हुए सबरीमला की यात्रा पर निकलते हैं. वहीं, वार्षिक पूजा के लिए मंदिर तक जाने की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है. और इस दौरान श्रद्धालुओं को खान-पान का ध्यान भी काफी रखना पड़ता है. ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पैदल चलना पड़ता है. 41 दिनों तक चलने वाले इस व्रत में कई नियमों का पालन करना होता हैं.

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बता दें कि सबरीमला के रास्ते में एक छोटा सा कस्बा पड़ता है. इस कस्बे का नाम है इरुमलै. ये कस्बा स्वामी अयप्पा के मंदिर से करीब 60 किलोमीटर पहले पड़ता है. तीर्थयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को यहां रुकना एक नियम है. और यहां एक सफेद भव्य मस्जिद भी है. जिसे वावर मस्जिद के नाम से जाना जाता है.

इस मस्जिद में श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा के साथ प्रवेश करते हैं और भगवान अयप्पा और वावरस्वामी का जयकारा लगाते हुए मस्जिद की परिक्रमा करते हैं. साथ ही यहां से श्रद्धालु विभूति और काली मिर्च का प्रसाद लेकर यात्रा के लिए आगे बढ़ते हैं. खास बात तो ये भी है कि जब ये तीर्थयात्री अपने रीति-रिवाज के अनुरूप मस्जिद में पूजा-पाठ करते हैं, तो उसी वक्त नमाज भी जारी रहती है.

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बता दें कि मस्जिद की परिक्रमा करने की परंपरा पिछले पांच सो साल से भी अधिक समय से चल रही है. विशेष रूप से सजाए गए हाथी के साथ जुलूस पहले मस्जिद पहुंचता है. इसके बाद पास के दो हिंदू मंदिरों में जाता है. यहीं नहीं बल्कि मस्जिद कमेटी हर साल सबरीमला मंदिर से अपने रिश्ते का उत्सव मनाती है, इस उत्सव को चंदन-कुमकुम कहा जाता है.

दरअसल सबरीमाला का मंदिर, मक्का मदीना के बाद यह दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है. जहां हर साल करोड़ो की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं. साथ ही श्रद्धालुओं का मस्जिद में पूजा करने का ये नियम हिन्दू- मुस्लिम के प्रति भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है.

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