अलग है बरसाने की होली की खासियत, ऐसे मनाते है बरसाने में होली,

रंगों की होली यूं तो पूरी दुनिया में खेली जाती है, लेकिन ब्रज की होली की बात ही कुछ अलग है. यहां होलाष्टक के साथ ही होली का जश्न शुरू हो जाता है. ब्रज के बरसाना और नंदगांव में होली अनोखे अंदाज में खेली जाती है. यहां की होली का नाम है लट्ठमार होली, जो फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है.

लट्ठमार होली ब्रज क्षेत्र का बहुत प्रसिद्ध त्योहार है. ब्रज में लट्ठमार होली की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यहां की लट्ठमार होली देखने के लिए देश विदेश से कई लोग हर साल यहां आते हैं

लट्ठमार होली केवल आनंद के लिए ही नहीं, बल्कि यह नारी सशक्तीकरण की भी प्रतीक मानी जाती है. इसके पीछे की कहानी श्रीकृष्ण से जुड़ी है. श्रीकृष्ण महिलाओं का सम्मान करते थे और मुसीबत के समय में हमेशा उनकी मदद करते थे. लट्ठमार होली में श्रीकृष्ण के उसी संदेश को प्रदर्शित किया जाता है. थोड़े से चुलबुले अंदाज में महिलाएं लट्ठमार होली में अपनी ताकत का प्रदर्शन करती हैं.

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मथुरा और बरसाना की लट्ठमार होली खुद में अनोखी विरासत को समेटे हुए है. कहा जाता है कि आज भी बरसाना की होली में श्रीकृष्ण और राधा रानी की झलक दिखाई देती है. अपने आराध्य भगवान कृष्ण की छवि यहां के हुरियारों में लोग देखने की कोशिश करते हैं.

बरसाने की हुरियारिनों और नंदगांव के हुरियारों के बीच लट्ठमार होली होती है. इसमें महिलाएं पुरुषों पर लट्ठ बरसाती हैं. पुरुष सिर के उपर छतरीनुमा चीज रखकर बचाव करते हैं. इससे पहले हुरियारे नंदबाबा मंदिर में आशीर्वाद के बाद पताका लेकर निकलते हैं और वहां से हुरियारे पीली पोखर पहुंचते हैं. साज-सज्जा और ढाल कसने के बाद रसिया गाते हैं, फिर लाड़िली जी मंदिर की ओर बढ़ जाते हैं. दर्शन के बाद वापसी में रंगीली गली में लट्ठमार होली खेली जाती है

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नंदगांव की लट्ठमार होली बरसाने की लट्ठमार होली का प्रतिरूप मानी जाती है. यहां बरसाना के हुरियारे और नंदगांव की हुरियारिनों के बीच होली होती है. इस होली में लाठी-ढाल का सामजंस्य देखने को मिलता है. बरसाना और नंदगांव की होली, आज भी ब्रज में भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के पवित्र प्रेम की कहानी की प्रतीक मानी जाती है.

नंदगांव की लट्ठमार होली बरसाने की लट्ठमार होली का प्रतिरूप मानी जाती है. यहां बरसाना के हुरियारे और नंदगांव की हुरियारिनों के बीच होली होती है. इस होली में लाठी-ढाल का सामजंस्य देखने को मिलता है. बरसाना और नंदगांव की होली, आज भी ब्रज में भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के पवित्र प्रेम की कहानी की प्रतीक मानी जाती है.

फाल्गुन की सप्तमी को ही राधा रानी के गांव बरसाने से फाग खेलने का न्यौता लेकर सखियां नंदगांव जाती हैं और नंदगांव के हुरियार बरसाना होली खेलने पहुंचते हैं. उनके लिए विधि-विधान से लट्ठमार होली खेलने का निमंत्रण जाता है और हुरियार अपने ढाल लेकर होली खेलने पहुंच जाते हैं.

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बरसाने की महिलाएं रंग घोलकर, लट्ठ लेकर अपनी पूरी तैयारी रखती हैं. नंदगांव की टोलियां जब पिचकारियां लिए बरसाना पहुंचती हैं, तो उन पर बरसाने की महिलाएं खूब लाठियां बरसाती हैं. पुरुषों को इन लाठियों से बचना होता है और साथ ही महिलाओं को रंगों से भिगोना होता है. नंदगांव और बरसाने के लोगों का विश्वास है कि होली का लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है.

ब्रज में एक बार आने वाले भक्त हर साल यहां खींचे चले आते हैं. ब्रज की होली में एक बार रंग जाने वाले पर कभी कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता है. यहां के प्यार भरे गुलाल में श्री कृष्ण का आशीर्वाद समाया होता है. लड्डूओं के मीठे स्वाद के बीच भजन लोकगीत चलता है.

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