उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे अर्ध कुंभ में साधु-संतों की अनूठी लीलाएं देखने को मिल रही हैं. वेशभूषा और बनाव-शृंगार के साथ ही साधना के तौर-तरीके भी निराले हैं. इनमें से कुछ अलख दरबार के संत भी हैं जो भिक्षा पर ही अधीन है. इन्हें अलखिया साधू भी कहा जाता हैं.

इन संतों की एक खासियत है, और वो ये कि भिक्षा लेते वक्त ये कभी रुकते नहीं है. जी हां, चलते-चलते इन्हों जो मिल जाए ये वही ले लेते हैं. अलख दरबार के साधु-संतों का जीवन त्याग और तपस्या से भरा है. ये भगवान शिव के साधक हैं. भिक्षा मांगते समय यह सिर्फ ओम और अलख निरंजन का उच्चारण करते हैं. इस दौरान ये बैठकर और खड़े होकर भिक्षा नहीं मांगते, बल्कि ये सिर्फ चलते रहते हैं और साधुओं तक को इन्हें भिक्षा देने के लिए दौडऩा पड़ता है.

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इनका पूरा जीवन शिव को समर्पित है. साथ ही इन्हें शिव का गण माना जाता है. इनकी कमर में भगवान शिव के वाहन नंदी की घंटी बंधी जाती है. ताकि जब ये चलें तो घंटी की गूंज से लोग रास्ता छोड़ते जाएं, और इनके कदम रुकने न पाएं.
भिक्षा में मिलने वाले अन्न को पकाकर ये पहले भगवान शिव को भोग लगाते हैं, फिर गरीब असहायों को भोजन कराते हैं. इसके बाद बचा हुआ प्रसाद भगवान का आशीर्वाद समझकर खुद ग्रहण करते हैं. साथ ही कई दिनों तक भिक्षा नहीं मिलने पर ये पानी पीकर भूख को शांत कर लेते हैं, लेकिन कभी हाथ फैलाकर किसी से भिक्षा नहीं मांगते.

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