‘आशिकों ने आशिकी में ताज महल तक बना दिए, साला हम एक संडास तक नहीं बना सके’

‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ फिल्म का अक्षय कुमार को बोला हुआ ये डायलॉग तो आप को याद ही होगा. टॉयलेट कह लो शौचालय कह लो या संडास. इसकी कीमत वही इंसान बता सकता जिसको प्रेशर आया हो और दूर-दूर तक कोई साधन नज़र नहीं आ रहा हो. उन लोगों से पूछिए इसका क्या मतलब होता है, जो लंबे दूरी के लिए बसों में सफर करते हैं. जब प्रेशर बनता है, तो हल्का होने के लिए उन्हें बस के रुकने का इंतज़ार करना पड़ता है.

सफर के दौरान ये लोग कितना सफर वही अंग्रेजी वाला, करते हैं इसका बस आप अंदाज़ लगा सकते हैं. खैर, वो तो बस है, अगर प्रेशर आपके बस से बाहर जाने को हो तो उसे ड्राइवर से कहकर कही भी रोका जा सकता है. जगंल में, सड़क किनारे हल्का भी हुआ जा सकता है. लेकिन उन यात्रियों के बारे में सोचे, जो ट्रेन में सफर करते हैं. आप कहेंगे क्या बकवास है, ट्रेन में तो संडास होता है और हर डिब्बे में चार-चार होते हैं. लेकिन हम आज की नहीं, उस ज़माने की बात कर रहे हैं, जब ट्रेन बिना संडास के चलती थी. एकदन मेट्रो की तरह.

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जीहां, एक ज़माना था जब भारतीय रेल में शौचालय नहीं हुआ करते थे. लोगों को अगर हल्का होना होता था तो उन्हें आने वाले स्टेशन का इंतज़ार करना पड़ता था. वहीं उतनी देर में ही इंसान को हल्का होने की मोहलत मिलती थी. लेकिन सोचकर देखिए एक हाथ में लोटा, दूसरी हाथ में धोती और ट्रेन चल पड़े. उस इंसान की हालत क्या हुई होगी. ये कोई काल्पनिक सीन नहीं है, बल्कि ऐसा एक यात्री के साथ हो चुका है. और इसी शख्स की वजह से आज आप आराम से ट्रेन में बैठकर सफर के दौरान मजे से हल्के होते हैं.

Indian Railways in Old Times

जीहाँ, उस शख्स का नाम था, ओखिल चंद्र सेन. इन्हीं की वजह से आज आप भारतीय रेल में आराम से शौच कर सकते हैं. उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने अपना दर्द, टूटी-फूटी अंग्रेजी में बयां किया था. दरअसल ये वाकया सन 1909 का है, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था. बात कुछ ऐसी थी, कि ओखिल चंद्र सेन रेल में सफर कर रहे थे. रेल से सफर के दौरान जब वो अहमदपुर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो उन्हें जोर से प्रेशर आया. इस वजह से वो ट्रेन से उतरकर शौच करने लगे. इतने में ही गार्ड ने सीटी बजा दी और रेल आगे बढ़ गई. फिर क्या था, एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में अपनी धोती पकड़े वो ट्रेन के पीछे भागने लगे. इस दौरान वो गिर गए और उनकी ट्रेन छूट गई. वो अहमदपुर स्टेशन पर अर्धनग्न हालत में खड़े रहे. गुस्से में ओखिल चंद्र सेन ने अंग्रेज सरकार को पत्र लिखकर कहा की ‘मुझे औरतों और दूसरे लोगों के सामने शर्मिंदा होना पड़ा है. तो आपसे गुज़ारिश है, कि आप उस ट्रेन के गार्ड पर एक बड़ी राशि का फाइन लगाए, नहीं तो मैं ये खबर अखबारों में दूंगा’। पत्र इतनी टूटी फूटी अंग्रेजी में लिखा था, कि पढ़कर आपको हँसी भी आ सकती है.

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ये रहा वो पत्र- ज़रूर पढ़ें
Letter By Okhil Chandra Sen.

कहा जाता है की भारत के 40 प्रतिशत लोग हमेशा सफ़र में रहतें हैं.आज भारतीय रेल मार्ग को दुनिया में चौथा सबसे बड़ा रेल मार्ग कहा गया है. आधुनिक तकनीक से लैस ट्रेन के बोगियों में लगभग आपको ज़रूरत की हर चीज़ मिल जाएगी. आपको अगर कोई दिक्कत है तो इसकी कम्प्लेंट भी आप ट्रेन में रहते ही कर सकते हैं. सोशल मीडिया के ज़माने में आप ट्वीट करके अपनी समस्या हल कर सकतें हैं.

Complaint by a Passenger done through Tweet

आपको बता दें, कि भारतीय रेल की शुरुआत 1853 में हुई थी. पहली भारतीय रेल 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से थाने के बीच में चली थी. लेकिन IIT रूडकी के लाइब्रेरी में रखी एक किताब में बताया गया है, कि भारत में सबसे पहले रेल 22 दिसंबर 1851 को रूडकी से पिरान कलियार के बीच चली थी. भारत की पहली पेसेंजर ट्रैन 15 अगस्त 1854 को चली थी. आपको ये भी जानकर हैरानी होगी, कि अंग्रेजों ने ही भारत को रेल दी है. पर भारत का पहला रेल मार्ग 2 भारतीय ‘जगनाथ शंकरसेठ और जमशेदजी जीजीभॉय’ ने बनाया था.

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