उमा भारती को इस शख्स ने किया था प्रपोज, तो मिला ये जवाब!

कहते हैं प्यार, इश्क,मोहब्बत खुदा की इबादत है. किसी से प्यार किया नहीं जाता हो जाता है. कमबख्त इश्क ऐसा जाल ही बुनता है कि उसमे ऐसे ऐसे शख्स फंस जाते हैं, जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता. नेता हो या अभिनेता खिलाड़ी हो या अनाड़ी, कोई ऐसा नहीं जिसे कभी किसी से मोहब्बत न हुई हो.

वो अलग की बात है कि कोई कहता है कोई छुपाता है. आज हम आपको एक ऐसी ही शख्सियत की प्रेम कहानी बताने जा रहे हैं. जिसको किसी से प्यार हो गया था. और जिनका नाम बीजेपी के साथ साथ भारत में बड़े आदर से लिया जाता है. जो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहीं, मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं और फिलहाल मोदी सरकार में भी कैबिनेट मंत्री हैं.

इससे भी बड़ी बात कि वे एक साध्वी हैं. जिन्हें हम उमा भारती के नाम से नाम से जानते हैं. जी हां उमा भारती से एक शख्स को प्यार हो गया था. यहां तक कि उस शख्स ने उमा भारती से विवाह के लिए प्रस्ताव भी रखा था.

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बात सन 1991 की है. लोकसभा चुनाव खत्म हो चुके थे. चुनावी माहौल में एक शख्स का भोपाल आना जाना कुछ ज्यादा ही हो रहा था. चुनाव खत्म होने के बाद कुछ फुर्सत के क्षण थे. उन्हीं दिनों उस शख्स ने उमा भारती के सामने शादी की इच्छा प्रकट की थी. उस शख्स का नाम था, गोविंदाचार्य. जो उस वक्त सरकार के अघोषित प्रमुख सलाहकार हुआ करते थे.

गोविंदाचार्य ने उमा भारती के सामने शादी का प्रस्ताव रखा है. इस बात की जानकारी उमा के भाई स्वामी लोधी को पता चली. उन्होंने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. उस वक्त उमा की उम्र 30 साल हुआ करती थी. इस घटना के एक साल बाद 17 नवंबर 1992 को उमा भारती ने 31 वर्ष की उम्र में संन्यास ले लिया था.

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ये किस्सा खुद उमा भारती ने 30 जून 2004 को राज्यपाल बलराम जाखड़ के शपथग्रहण समारोह में सुनाया था. तब वे मध्य प्रदेश की सीएम हुआ करती थीं. भोपाल के रवींद्र भवन में सनातन भारत जागृत भारत नाम के पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम भी था.

कार्यक्रम में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर विशेष रुप से आए थे. उमा भारती ने कार्यक्रम में बोलना शुरू किया. और अचानक अपने और गोविंदाचार्य के निजी संबंधों पर बोलना शुरू कर दिया. उन्होंने बताया कि किस तरह से गोविंदाचार्य ने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा था. उनके इस भाषण को सुनकर पूरा हॉल सन्न रह गया.

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उस वक्त हॉल में बीजेपी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कैलाश जोशी, संगठन मंत्री कप्तान सिंह, उनको प्रपोज करने वाले  गोविंदाचार्य और उमा भारती के भाई स्वामी लोधी भी बैठे हुए थे. उनकी ये बातें सुनकर गोविंदाचार्य और स्वामी लोधी सिर्फ मुस्कुराते रहे. लेकिन कोई और भी था. जिसे इस भाषण से गुरेज था. वो था हिंदू संगठन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आएसएस. उमा भारती का ये भाषण जंगल की आग की तरह पूरे राजनीतिक दुनिया में फैल गया.

संघ के भीतर इसे बिल्कुल अच्छा नहीं माना गया. और ऐसा लगा जैसे उमा भारती सचमुच कुछ भी कह सकती हैं. उमा भारती का ये भाषण आने वाले समय में बहुत महंगा पड़ने वाला था. और उन्हें अंतत: तिरंगा प्रकरण में अपना इस्तीफा देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी.

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