हम सब जानते हैं कि चांद पर पहला इंसान भेजने वाला देश अमेरिका था. उस वक्त सोवियत संघ और अमेरिका के बीच होड़ मची थी चांद पर इंसान भेजने की. दोनो के बीच 60 के दशक में शीत युद्ध जो चल रहा था. 12 सितंबर 1959 को रूस के लूना 2 मिशन को कामयाबी मिली. इसी मिशन के तहत रूस पहली बार चंद्रमा पर यान उतारने में सफल रहा. तो ऐसे में अमेरिका अपनी स्पेस एजेंसी नासा पर लगातार दबाव बना रहा था.  चांद पर सबसे पहले इंसान उतारने के लिए.

उस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने नासा के सामने लक्ष्य रखा. लक्ष्य ये कि वो इंसान को चांद पर सोवियत संघ से पहले भेजने के मिशन को अंजाम दे . नासा ने इस लक्ष्य को पूरा भी किया. लिहाज़ा नासा ने चांद पर इंसान को तो भेजा ही. साथ ही अमरीकी स्पेस एजेंसी ने ये भी साबित करने की कोशिश की कि जब उसके अंतरिक्ष यात्री चांद पर गए तो उन्होंने कुछ नायाब काम किया.

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दरअसल आज से करीब 50 साल पहले 20 जुलाई 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने ईगल नाम के लैंडर के जरिए अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज एल्ड्रिन को चांद पर उतारा था. इसके बाद 19 नवंबर 1969 को नासा ने इंट्रेपिड नामक लैंडर के जरिए अंतरिक्ष यात्री चार्ल्स पीट कॉनरैड और एलेन बीन को चांद पर उतारा.  इन्होंने चांद पर भूकंप को रिकॉर्ड किया.

अपोलो 11 और अपोलो 12 मिशन की सफलता के बाद अमेरिका ने सफलता के नए मुकाम हासिल किए. अपोलो 15 मिशन में पहली बार 30 जुलाई 1971 को अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने फॉल्कन लैंडर के जरिए डेविड स्कॉट और जेम्स इरविन को चांद पर उतारा. डेविड ने चंद्रमा पर खुली कार जैसा दिखने वाला लूनर रोविंग व्हीकल चलाया.

अपोलो 15 कमांड मॉड्युल के पायलट अल वर्डेन का कहना है कि इन दौरों से मिली जानकारी उनके लिए काफ़ी महत्वपूर्ण थी. चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री अपने साथ हथौड़े, ड्रिल मशीन और कुदाल ले गए गए थे ताकि अगर चांद पर खुदाई करने की नौबत आए तो इन सब चीजों का इस्तेमाल किया जा सके. इस मिशन में चांद और धरती के बीच की दूरी भी पता चली. जिसका श्रेय वार्डेन को ही जाता है.उनके मिशन के दौरान ही चांद पर ऐसा लेज़र उपकरण छोड़ा गया था जिसे रेंजिंग रेट्रोरिफ़्लेक्टर कहा जाता है. ये ख़ास तरह के आईने हैं, जिन्हें इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि इन्हें धरती से टेलिस्कोप की मदद से लेज़र रिफ्लेक्ट करके पृथ्वी से चांद तक की सही दूरी आंकी जा सकी. इसका इस्तेमाल आज भी किया जाता है.इन्हीं की वजह से एस्ट्रोनोमर्स को चांद की कक्षा की बेहतर समझ हो पाई है. इन्हीं के ज़रिए हमें ये जानकारी भी मिली है कि चांद हर साल हमसे 38 मिलीमीटर दूर होता जा रहा है.

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तो वहीं 7 दिसंबर 1972 में लॉन्च हुआ मिशन अपोलो 17 में अमेरिका को चांद पर चट्टानों के छोटे-छोटे मोती जैसे टुकड़े मिले जो इस बात के सबूत हैं कि चांद पर भी चट्टानों के बनने और टूटने की प्रक्रिया चलती रहती है. इनके कुछ सैम्पल पर रिसर्च करने पर चांद और धरती के बनने का इतिहास पता चला. साथ ही ये भी साबित हो गया कि धरती और चांद का निर्माण दो बड़े ग्रहों और खगोलीय पिंडों के टकराने से हुआ है.

सुनने में ये जितना आसान लगता है उतना है नहीं. अमेरिका ने 1950  के दशक से ही चांद को लेकर कई मिशनों की तैयारी की हुई थी. पचास के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चांद के कई पहलुओं को पहले जानने के लिए होड़ लगी हुई थी. दोनों ही देशों ने कई मिशन भेजने की कोशिश की और कई बार असफल हुए.

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