राजस्थान के जोधपुर में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान राम मंदिर पर एक सवाल के जवाब में कांग्रेसी सरकार में मंत्री सुबोधकांत सहाय ने जो कहा, उसने एक बहस को पैदा कर दिया है. सुबोधकांत सहाय ने कहा, कि ‘कांग्रेस सरकार तो राम मंदिर पर कानून लेकर आई थी, तब बीजेपी, संध और वीएचपी ने इसका विरोध क्यों किया था?.

तो क्या वाकई कांग्रेस ने कभी राम मंदिर को लेकर पहल की थी और क्या उसका बीजेपी, वीएचपी और संघ ने विरोध किया था? तो इसका जवाब है, हां. 25 साल पहले कांग्रेस सरकार अयोध्या मसले पर अध्यादेश लेकर आई थी, जिसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया था. तब बीजेपी ने इसका विरोध किया था.

मंत्री सुबोधकांत सहाय

वाकया तब का है, जब वीएचपी की अगुवाई में बीजेपी के समर्थन से चल रहे राम मंदिर आंदोलन के तहत 6 दिसंबर 1992 को विवादत ढांचे को जिसे बाबरी मस्जिद बताया जाता है, को गिरा दिया गया था. इसके एक साल बाद ही जनवरी 1993 में कांग्रेस सरकार की ओर से ये अध्यादेश लाया गया था. इस अध्यादेश के मुताबिक विवादित परिसर की कुछ जमीन का सरकार अधिग्रहण करने वाली थी. नरसिम्हा राव सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों ओर 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी.

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इसे लेकर कांग्रेस सरकार की योजना अयोध्या में एक राम मंदिर, एक मस्जिद, एक लाइब्रेरी, म्यूजियम के साथ ही कई दूसरी सुविधाओं के निर्माण की थी. तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 7 जनवरी 1993 को इसे मंजूरी भी दे दी थी. राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा में रखा था, जिसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया.

 गृहमंत्री एसबी चव्हाण

बिल पेश करते समय तत्कालीन गृहमंत्री चव्हाण ने कहा था, “देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना को बनाए रखना जरूरी है.”  ऐसा ही कुछ तर्क बीजेपी और आरएसएस के नेता भी देते रहे हैं. और आज भी देते हैं. लेकिन उस वक्त  अयोध्या अधिनियम का बीजेपी ने पुरजोर विरोध किया था. बीजेपी के तत्कालीन उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था. बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठन भी इस कानून के खिलाफ थे.

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नरसिम्हा राव सरकार ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से इस मसले पर सलाह भी मांगी थी. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था, कि क्या राम जन्भूमि बाबरी मस्जिद के विवादित जगह पर कोई हिंदू मंदिर या कोई हिंदू ढांचा था. 5 जजों की एक खंडपीठ ने इन सवालों पर विचार भी किया था लेकिन इस सवाल का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था.

नरसिम्हा राव राम मंदिर को लेकर

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या एक्ट 1994 की व्याख्या भी की थी. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के आधार पर विवादित जगह के जमीन संबंधी मालिकाना हक यानी कि टाइटल सूट से संबधित कानून पर स्टे लगा दिया था. कोर्ट ने ये कहा था कि जब तक इसका निपटारा किसी कोर्ट में नहीं हो जाता तब तक इसे लागू नहीं किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मस्जिद एक लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं का इंतजाम करने की बात का समर्थन किया था लेकिन ये भी कहा था कि ये राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है. इस तरह अयोध्या पर कांग्रेस की ओर से लाया गया ये एक्ट बेकार हो गया था.

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आपको बता दें, कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमीन के मालिकाना हक के बारे में फैसला दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इस फैसले में कोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन को 3 हिस्सों में बांटा हैं. जिसमें राम लला (विराजमान), निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को ये ज़मीन तीन हिस्सों में बांटी है.

राम मंदिर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इसी फैसले को पलटने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर कर गईं. उसी पर लगातार सुनवाई जारी है. हाल ही में नवनियुक्त चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये कहकर सुनवाई को 2019 तक के लिए टाल दिया था कि कोर्ट की प्राथमिकता में दूरसे कई मुद्दे हैं. जिसके बाद हिंदूवादी संगठनों के साथ संतों और बीजेपी के कई सांसदों की ओर से कानून बनाने की मांग उठने लगी है.

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