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JNU में इसलिए नहीं होता था दीक्षांत समारोह, 46 साल बाद हुआ कार्यक्रम
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JNU में इसलिए नहीं होता था दीक्षांत समारोह, 46 साल बाद हुआ कार्यक्रम 

JNU का नाम आते ही हमारे जेहन में क्या आता है? देश विराधी नारे लगाने वाले कुछ छात्र, कन्हैया कुमार और वहां आए दिन होने वाले विवाद. लेकिन जेएनयू का ये एक पक्ष है, दूसरा ये कि जेएनयू दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक हैं. यहां से पढ़कर निकले छात्र देश की राजनीति से लेकर दूसरे क्षेत्रों में डंका पीट रहे हैं. देश की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन, मेनका गांधी, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, योगेंद्र यादव इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं. ये विश्वविद्यालय जितना नामी है, उतनी ही बदनाम भी. और इसकी वजह है विश्वविद्यालय में पनपने वाला लोकतंत्र, छात्र संघ और वे मुखर छात्र जो हर जुल्म ज्यादती के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते रहते हैं. हालांकि इनमें से कुछ भटक भी जाते हैं.

Protest in JNU

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कल यानी की 8 अगस्त को 46 साल बाद दीक्षांत समारोह का आयोजन किया गया. आप ये सुनकर चौंक गए होंगे, कि 46 साल बाद. जीहां चार दशकों से इस विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह ही नहीं हो रहा था. देश का ऐसा कोई विश्वविद्यालय शायद ही होगा जहां दीक्षांत समारोह ना होता हो. ऐसा नहीं है, कि पहले कभी हुआ नहीं. एक बार हुआ था 1952 में. इस पहले दीक्षांत समारोह में एक्टर बलराज साहनी गेस्ट के तौर पर आए थे. उस वक्त दिया हुए उनके भाषण ने काफी सुर्खियां बंटोरी थी. बलराज साहनी ने कहा था, कि

‘मुझे इस प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में आमंत्रित किया गया ये मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है। मुझे यहां झाड़ू भी मारने बुलाया जाता तो मैं आ जाता। जिसके नाम पर ये यूनिवर्सिटी है उनका व्यक्तित्व मुझे काफी प्रभावित करता है।’

Balraj Sahni in JNU Convocation 1952

वैसे तो बलराज साहनी हिंदी फिल्मों और थिएटर के मशहूर और संजीदा अभिनेता थे। लेकिन वे फिल्म जगत के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे शख्स भी माने जाते थे। वे एक्टर होने से पहले विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के प्रोफेसर भी रह चुके थे और उन्होंने बीबीसी में पत्रकार के तौर पर काम भी किया था। लेकिन ये पहला समारोह आखिरी ही साबित हुआ. इसके बाद इस साल यूनिवर्सिटी के इतिहास में दूसरा दीक्षांत समारोह हुआ.

2nd Convocation in JNU

चालीस साल से बच्चे भी पढ़ रहे हैं. पढ़कर निकल रहे हैं. तो फिर उनको क्या डिग्री ऐसी ही थमा दी जाती थी? जीहां ऐसे ही थमा दी जाती थी. खैर इस साल हुए दीक्षांत समारोह में क्या खास हुआ ? समारोह को लेकर छात्रसंघ ने जमकर विरोध किया था. इसके बहिष्कार की चेतावनी भी दी थी. लेकिन ये समारोह हो गया. इसका आयोजन कैंपस से बाहर ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन में किया गया. हालांकि जेएनयू प्रशासन ने बताया, कि वेन्यू में बदलाव छात्रों के बायकॉट की वजह से नहीं किया गया.

JNU File Pic

समारोह में छात्रों को पीएचडी की डिग्रियां तो दी ही. इसके साथ देशभक्ति का संदेश भी दिया. दरअसल देश में पहली बार किसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आर्मी और बीएसएफ के बैंड ने प्रस्तुति दी इसका मकसद छात्रों को भारतीय सेना के काम से रूबरू करवाने के साथ ही नेशनल डिफेंस एकेडमी के छात्रों को कैंपस से जोड़ना भी था. जेएनयू देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है, जहां नेशनल डिफेंस एकेडमी से पासआउट अधिकारियों को उच्च शिक्षा की पढ़ाई करवाई जाती है.

अब आते हैं मुद्दे पर कि आखिर यहां 46 साल तक दीक्षांत समारोह क्यों नहीं हुआ. तो बात दरअसल ये है, कि जब पहला दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया था तब समारोह में मंच  से तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष वीसी कोशी ने सरकार विरोधी भाषण दे दिया था। छात्रसंघ ने मांग की थी कि उनके नेता को भी मंच से बोलने दिया जाये। बताया जाता है कि छात्रसंघ की यह बात इस शर्त के साथ मान ली गई कि छात्रसंघ का नेता वही भाषण देगा, जिसकी मंजूरी विश्वविद्यालय प्रशासन ने दी होगी, लेकिन जब माकपा की छात्र इकाई स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से अध्यक्ष बने वीसी कोशी मंच पर भाषण देने के लिये चढ़े तो उन्होंने वह नहीं बोला जिसकी बोलने की उन्हें इजाजत थी। इसके उलट उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी सरकार की जमकर आलोचना की। इस खबर को अखबार में जोर-शोर से प्रकाशित किया गया। बाद में सरकार ने इस कार्यक्रम को अनिश्चित काल के लिये स्थगित करने का फैसला लिया।

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