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तो ये थे ऐसे प्रधानमंत्री जो संसद मे एक बार भी नहीं बोल पाए…
किस्सा-कहानी

तो ये थे ऐसे प्रधानमंत्री जो संसद मे एक बार भी नहीं बोल पाए… 

किस्सा कहानी मे आपका स्वागत है. आज हम आपको किस्सा बताएंगे भारत के ऐसे प्रधानमंत्री का जो प्रधानमंत्री तो बने लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए संसद मे बोल नही पाए. अब आप सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है. प्रधानमत्री के पास तो काफी सासदों का समर्थन होता है. वो तो मंत्रियों में भी सबसे बडा मंत्री होता है प्रधानमंत्री. तो हम आपको बताते हैं कि ऐसा कैसे हुआ। किस्से कि शुरुआत करते हैं और चलते हैं सन् 1975 में. इंदिरा गांधी इस देश की कमान संभाले हुए थीं, देश कि प्रधानमंत्री थीं. देश के माहौल मे उठापटक होने लगा. इंदिरा ने एक डिसीजन लिया यानि एक फैसला लिया और देश मे इमर्जेंसी लगा दी.

संजय गांधी अपनी मां इंदिरा गांधी के साथ

सरकार का विरोध करने वाले बड़े-बड़े नेताओं को जेल मे डाल दिया गया. देश मे विपक्ष ने अपनी आवाज और बुलंद कर दी. छात्र नेता भी सड़कों पर उतर आए. छात्र संगठन के युवा नेताओं को भी जेल मे डाल दिया गया. इस दौरान एक नेता थे, जिन्हें किसानों का मशीहा कहा जाता था. किसान के घर से आते थे, जाट नेता थे, नाम था चौधरी चरण सिंह, पढ़े लिखे थे, बड़ी अच्छी अग्रेंजी बोला करते थे, विद्वान थे, इमर्जेंसी के इस दौर मे चौधरी चरण सिंह को भी जेल में डाल दिया गया.

चौधरी चरण सिहं, मध्य में

1977 में लोकसभा के चुनाव हुए. काग्रेस हार गई मतलब इंदिरा गांधी हार गईं. आजाद भारत में पहली बार गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई और इसी के साथ मानो देश में लोकतंत्र कि एक इमारत का निर्माण हो गया था. जनता पार्टी की सरकार बनी. मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने और चरण सिंह उप-प्रधानमंत्री बने. गृहमंत्री का पद भी इनके पास था.

मोरार जी दसाई

पार्टी मे शायद क्रांतिकारी नेताओं को साथ-साथ महत्वाकाक्षी नेता भी ज्यादा हो गए. जनता पार्टी टूटने लगी. मोरार जी देसाई की सरकार गिर गई. इसके बाद 28 जुलाई 1979 को कांग्रेस के सपोर्ट से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. सोच कर देखिए कैसा महौल रहा होगा. जो कल तक खिलाफ थे वो आज समर्थन में हैं. वैसे ऐसा समर्थन तो मेरी उम्र (22) के युवाओ ने केजरीवाल कि पहली सरकार के दौरान भी देखा था. खैर आगे बताते हैं कि चौधरी साहब की सरकार के साथ क्या हुआ.

चौधरी चरण सिंह और उनके बाएं में चंद्रशेखर

28 जुलाई 1979 को सरकार बनी और चौधरी साहिब को 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था बहुमत साबित करने के लिए. इंदिरा ने 19 अगस्त को समर्थन वापस ले लिया. सरकार गिर गई. संसद मे बिना बोले चौधरी चरण सिंह को इस्तीफा देना पड़ा यानी रिजाइन करना पड़ा. इस देश के करोडों किसानों को उम्मीदें थीं कि उनके किसान नेता उनके लिए कोई बड़ी सौगात लाएंगे लेकिन चौधरी साहब के पास समर्थन ही नहीं था और वक्त भी. वो संसद मे कुछ बोल ही नही पाए. बिना बोले प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

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