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एक ऐसा क्लब जहां हंसने नहीं रोने आते हैं लोग!
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एक ऐसा क्लब जहां हंसने नहीं रोने आते हैं लोग! 

आपने लॉफिंग क्लब तो सुना होगा लेकिन इस क्लब के बारे में कभी नहीं सुना होगा जहां लोग रोने के लिए इक्ट्ठा होते हैं और जोर-जोर से रोते भी है. ये क्लब है गुजरात के सूरत में जहां लोग सिर्फ रोने आते है. यहीं नहीं रोने के लिए यहां महफिल लगती है और एक एक करके सब रोते हैं. इस क्लब का नाम है हैल्थी क्राइँग क्लब जहां लोग खासतौर पर रोने के लिए ही आते हैं.

इस हैल्थी क्राइंग क्लब को चलाते है कमलेश भाई मसालावाला. जो लोगों को रोने के लिए प्रेरित करते हैं. क्योंकि कमलेश भाई का मानना है कि हंसने से ज्यादा जरूरी रोना है. वजह है कि रोने से शरीर हल्का हो जाता है.शरीर के अंदर से सारी बेकार चीजें आंसुओं के जरिए बाहर आ जाती है.

यहीं नहीं इस क्लब में लोगों की खासी भीड़ रहती है. लोग रोज सुबह यहां आते है रोते हैं और अपना मन हल्का कर लेते हैं. खुद यहां आने वाले लोग कहते हैं कि उन्हें रोना अच्छा लगता है. इसीलिए वो रोज यहां आना पसंद करते हैं.

रोने का ये कार्यक्रम शुरू कैसे होता है ये भी आपके बता देते हैं. क्लब में आते ही लोग पहले कमलेश भाई मसालावाला को थोड़ी देर सुनते हैं, इसके बाद सब अपनी सीट पर बैठे- बैठे रोने लगते हैं. रोते समय कुछ लोग एक दूसरे को गले भी लगते हैं. और मिल कर अपना मन हलका कर लेते हैं.

हैल्थी क्राइंग क्लब में कई बड़े बुजुर्गों के साथ लड़के लड़कियां भी आते हैं और रोज रोते हैं. रोना सेहत के लिए हेल्थी है ये साइंस भी मानता है.

बता दें, नीदरलैंड्स में हुई हाल की एक स्टडी में भी इस बात का खुलासा हुआ रोने वाले लोग न रोने वाले लोगों से ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं. वहीं अल्जाइमर रिसर्च सेंटर रीजन्स हॉस्पिटल फाउंडेशन के डायरेक्टर, विलियम एच फ्रे ने भी बताया कि  हम रोने के बाद इसलिए अच्छा महसूस  करते हैं क्योंकि इससे तनाव के दौरान उत्पन्न हुए कैमिकल्स बाहर निकल जाते हैं.

फ्रे के मुताबिक, ये जरूरी है कि हम कभी-कभार रोएं. इससे तनाव कम होता है और हार्ट और दिमाग स्वस्थ्य रहते हैं. इसीलिए हमें अपनों बच्चों को रोने से नहीं रोकना चाहिए बल्कि हमें खुश होना चाहिए कि उनके अंदर ये क्षमता है.

ऐसा नहीं है कि भावुक होकर रोना ही हेल्थी है बिना भावुक हुए रोने से भी सेहत को फायदे हैं. जब आप प्याज काटते हैं तो प्याज से एक रसायन निकलता है और आंखों की सतह तक पहुंचता है. इससे सल्फ्यूरिक एसिड बनता है. इससे छुटकारा पाने के लिए आंसू ग्रन्थियां आंसू निकालती है जिससे आंखों तक पहुंचा रसायन धुल जाता है. आंसुओं में लाइसोजाइम भी होता है जो एंटीबैक्टीरियल और एंटी वायरल होता है. ग्लूकोज से आंखों की सतह की कोशिकाएं मजबूत होती हैं.

डॉक्टर फ्रे के मुताबिक,  महिलाएं महीने में औसतन 5.3 बार रोती हैं जबकि पुरुष औसतन 1.3 बार ही रोते हैं. इस फर्क की वजह ये है कि पुरुषों में टेस्टरोन होता है जबकि महिलाओं में प्रौलैक्टीन नामक हार्मोन होता है जो रोने के लिए प्रेरित करता है.

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